परम पूज्य श्रुतरत्न गणिवर्य श्री वैराग्यरतिविजयजी म.सा.
अनेक भाषा तथा अनेक विषयों का ज्ञान कुछ गिने चुने व्यक्तियों में ही विद्यमान होता है। उन व्यक्तियों में से एक है गणिवर्य वैराग्यरतिविजयजी म.सा.। प्राचीन लिपि, प्राचीन लेखनकला तथा प्राच्यविद्या के सभी विषयों का ज्ञान से आप संपन्न हैं। भाषा संबंधी ज्ञान के विषय में कहा जाय तो आपको संस्कृत, अपभ्रंश, प्राकृत भाषाएं (प्राकृत यह भाषा समूह का नाम है जिसमें पांच से छह अन्य तत्कालीन बोलीभाषाओं का समावेश होता है), मरुगुर्जर (प्राचीन गुजराती), पाली (बौद्ध ग्रंथों की भाषा), हिंदी, मराठी, अंग्रेजी, गुजराती आदि भाषाओं का ज्ञान है। भाषाओं के ज्ञान के साथ साथ एक कुशल संपादक एवं प्राच्यविद्या के संशोधक को प्राचीन लिपि तथा लेखन कला का ज्ञान होना स्वाभाविक है। प्राचीन लिपियों ज्ञान के विषय में आपको सम्राट् अशोककालीन ब्राह्मी लिपि (ई.स.पूर्व ३री सदी), कुटील लिपि (ई.स.७वी सदी), शारदा लिपि (ई.स.९वी सदी), ग्रंथ लिपि (ई.स.४-५वी सदी), प्राचीन देवनागरी लिपि(ई.स.९वी सदी) इत्यादि लिपियों का ज्ञान है। इससे एक कुशल संपादक एवं संशोधक की पहचान होती है। इसके अलावा दर्शनशास्त्र (Philosophy) में विशेष पारंगत होते हुए भी साहित्य, व्याकरण, इतिहास, भाषाशास्त्र, पूजन विधि, ज्योतिष आदि का विशेष अभ्यास एवं गहन जानकारी भी आपकी विशेषता है।
भारत की प्राचीन ज्ञानसंपदा को सुरक्षित एवं लोकोपभोग्य करने हेतु गणिवर्य श्री वैराग्यरतिविजयजी म.सा. की संकल्पना एवं योगदान—
हस्तलिखितों में लिखे हुए बहुत से प्राचीन शास्त्र आजतक अप्रकाशित हैं। जो प्रकाशित है उनमें भी लेखनप्रमाद के वश से, मुद्रण की त्रुटी से अपपाठ प्रविष्ट हुए है। वर्तमान पीढी को संशोधित एवं संपादित शुद्ध शास्त्रपाठ मिलने हेतु प्राचीन लिपि में लिखे हुए शास्त्रों को शुद्ध रूप से चिकित्सित संपादन करने की संकल्पना गुरुदेव ने की। इस संकल्पना से कई वर्ष गुरुदेव ने ३० से अधिक ग्रंथों का संपादन किया।
प्राचीन लेखन परंपरा, प्राचीन लिपियों का ज्ञान सीमित व्यक्तियों तक न रहते हुए युवा पीढी को भारत की प्राचीन संस्कृति, इतिहास, लेखन कला, शास्त्र, तत्त्वज्ञान आदि विषयों का ज्ञान होना आवश्यक है। इसी कार्य को एक संस्था का स्वरूप दिया जाय तो बहुत सारे शास्त्रों का संपादन कार्य भी होगा और युवा पीढी भी इस प्राचीन विद्या से अवगत होगी इस असाधारण लक्ष्य को लेकर गुरुदेव ने विद्या की नगरी पुणे में ईसवी सन् २०११ में श्रुतभवन संशोधन केंद्र नामक संस्था की स्थापना की।
युवा विद्यार्थियों को अभ्यास वर्ग प्रकल्प के माध्यम से प्राचीन हस्तलिखित शास्त्रों का सूचीकरण, आधुनिक पद्धति से स्केनिंग (डिजिटायजेशन), संपादन एवं प्राचीन भारत की संस्कृति, लेखनकला इत्यादि विषयों का ज्ञान प्रदान करना प्रारंभ किया। प्राच्यविद्या के क्षेत्र में ऐसे विशाल लक्ष्य एवं कार्यक्षमता के आधारपर कार्य करनेवाली विश्व में एकमात्र ही ऐसी संस्था है।
गणिवर्य वैराग्यरतिविजयजी म.सा. ने अथक परिश्रम एवं दूरदृष्टि से श्रुतभवन संशोधन केंद्र में मात्र तीन वर्ष में ही २० प्रशिक्षित प्राच्यविद्या के क्षेत्र के विद्वान् तैयार किये। संस्था के गतिमान कार्य में निम्नलिखित प्रकल्प प्रवर्तमान हैं। इन प्रकल्पों का अपना अनन्यसाधारण महत्त्व है। भारतीय संस्कृति तथा इतिहास के कईं पन्ने जो अद्यावधि अंधकारग्रस्त हैं, वे इन प्रकल्पों से उजागर होंगे।
गणिवर्य श्री वैराग्यरतिविजयजी म.सा. के मार्गदर्शन में श्रुतरत्न संशोधन संस्थान में प्रवर्तमान प्रकल्प—
१) वाचना –
हमारे अनेक प्राचीन शास्त्र आज तक प्रकाशित नहीं हुए हैं। अनेक मुद्रित शास्त्रों का परिमार्जन भी आवश्यक है। इस प्रकल्प में इन शास्त्रों का प्राचीन हस्तलिखित प्रतों के आधार पर परिमार्जित संस्करण तैयार हो रहा है। भारतभर के विभिन्न ग्रंथभंडारों से प्राप्त हस्तलिखित ग्रंथों का शास्त्रशुद्ध पद्धति से चिकित्सक संशोधन और संपादन करना इस प्रकल्प का प्रमुख लक्ष्य है। कईं ग्रंथ पहली बार हस्तलिखित स्थिति से बाहर आकर प्रकाशित हो रहे हैं। इससे दर्शन, साहित्य, व्याकरण, ज्योतिष आदि विविध विषयों में नई जानकारी प्राप्त हो रही है।
इस प्रकल्प में गत लगभग २००० साल के समयावधि में रचित आजतक अप्रकाशित ग्रंथों का संशोधन-संपादन किया जाता है जिससे उन उन शास्त्रों में वर्णित घटनाओं एवं वर्णनों से तत्कालीन समाज की व्यवस्था, राजनीति, सांस्कृतिक पद्धति, लोगों का आचार-विचार, अर्थव्यवस्था, सामाजिक परिवेश, भौगोलिक स्थिति, धार्मिक परिस्थितियां इत्यादि विषयों पर विशद प्रकाश पडता है। । अनेक ग्रंथों में से अद्यावधि अपरिचित ग्रंथकार, राजा, नगर, अनेक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति, उनका समय जैसे अनेक अंगों का नया ज्ञान भी प्राप्त हो रहा है। वर्तमान में पीएचडी, एम् फिल आदि पदवी हेतु विद्यार्थियों को शुद्ध, प्रामाणिक संदर्भ सामग्री की आवश्यकता रहती है। इस प्रकल्प से उन्हें प्रामाणिक दस्तावेज प्राप्त होंगे। इस प्रकल्प के अंतर्गत शुद्ध संपादित शास्त्र भारत के विभिन्न विद्यापीठ, संशोधन संस्था, ग्रंथागारों में निःशुल्क वितरित किये जाते हैं जिससे विभिन्न स्थलों के विद्यार्थी एवं विद्वानों को इसका लाभ मिल रहा है। गुरुदेव का यह आग्रह रहता है कि कोई भी व्यक्ति प्राच्यविद्या से संबंधित उपयुक्त सामग्री से वंचित नहीं रहना चाहिए अतः यह सेवा निःशुल्क रूप से उनके पास यथाशीघ्र पहुंचना आवश्यक है। इसके अलावा इस प्रकल्प में संपादित शास्त्रों को चिरकाल तक संरक्षित रखने के लिए प्राचीन पद्धति से ताडपत्रों पर अंकित करके भारत के विभिन्न प्रदेशों में स्थित हस्तलिखित संग्रहालयों में स्थापित भी कर रहे हैं जिससे आगामी ७०० से ८०० साल तक हमारी ज्ञानसंपदा भविष्य की पीढी तक निरंतर प्रवाहमान होती रहेगी।
२) वलभी –
भारत के इतिहास में आज तक जितने भी शास्त्र हाथ से लिखे गये हैं, उनका एक विशाल सूचिपत्र तैयार करना इस प्रकल्प का मुख्य उद्देश्य है। आज अनेक हस्तलिखित संग्रहों के सूचिपत्र विद्यमान है पर किसी संपादक को किसी एक ग्रंथ पर संशोधनात्मक कार्य करना हो तो उसे सभी सूचिपत्रों को देखना होगा तथा किसी ग्रंथागार में स्थित हस्तलिखितों की सूचि यदि निर्माण ही न हुई हो तो उसकी जानकारी न होने से वह विद्वान को उपलब्ध नहीं होगी। सभी सूचिपत्रों को देखना तथा सभी ग्रंथागारों में से हस्तलिखित को यथाशीघ्र प्राप्त करना ज्यादातर असंभव ही प्रतीत होता है। इस परिश्रम एवं उन ग्रंथों की उपयुक्तता को ध्यान में रखते हुए गणिवर्य वैराग्यरतिविजयजी म.सा. ने इस प्रकल्प की संकल्पना की है। इस प्रकल्प के माध्यम से १० लाख से ज्यादा हस्तलिखितों की जानकारी एक ही जगह पर उपलब्ध होगी। तथा उन्हें प्राप्त कराने के लिए संपूर्ण सहयोग देने का भी कार्य इस माध्यम से हो रहा है। भारत में स्थित विद्वानों के साथ साथ विदेश के विद्वानों को भी इस प्रकल्प से सहयोग मिल रहा है जिससे संशोधक छात्र, विद्वान् आदि को उसकी जानकारी तथा उपयुक्त सामग्री अत्यंत कम समय में एवं सहजता से उपलब्ध हो रही है फलतः समय और श्रम की बचत हो रही है। गणिवर्य वैराग्यरतिविजयजी म.सा. द्वारा निर्मित एक विशिष्ट प्रारूप में अबतक लगभग ७ लाख हस्तलिखितों की जानकारी का संग्रह कर उसे एक सोफ्टवेयर में समाविष्ट किया है। विद्यापीठ, प्राच्यविद्या संस्थान, जैन मंदिर आदि में बड़ी संख्या में प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों का संग्रह होता है। लेकिन इन ग्रंथों का आधुनिक पद्धति से सूचीकरण न होने से संशोधकों को इन ग्रंथों की उपलब्धि नहीं होती। अतः इन ग्रंथों में लिखा बहुत सारा ज्ञान अभी भी अंधकारग्रस्त है। इस कमी को दूर करने के लिए वर्धमान जिनरत्नकोश प्रकल्प समर्थ है। इससे अद्यावधि अप्राप्त अनेक ग्रंथ अब प्रकाश में आ रहे हैं और आधुनिक संशोधकों को ज्ञात भी हो रहे हैं। युवा संशोधक, विद्वानों को प्रामाणिक जानकारी एवं अत्यल्प समय में संशोधन की सर्वसमावेशक उपयुक्त सामग्री प्राप्त होने से इस कार्य में रुचि उत्पन्न हो रही है। फलतः समाज में नैतिक मूल्यों का विकास हो रहा है हमारी प्राचीन धरोहर की सुरक्षा के लिए जागृति भी आ रही है।
३) विद्या –
प्राचीन हस्तलिखितों में लिखे हुए शास्त्रों का संशोधन कार्य आसान नहीं है। विशाल शास्त्रों के संशोधन हेतु कुशल मानव संसाधन (Skilled Human Resource) की आवश्यकता रहती है। पूज्य गुरुदेव ने इस दिशा में कदम उठाया है। संपादन कार्य में एवं प्राच्यविद्या के क्षेत्र में युवा विद्यार्थियों को प्राचीन गुरुकुल पद्धति का अनुसरण करते हुए भारत की सबसे प्राचीन ब्राह्मी लिपि तथा उस लिपि से विकसित अन्य लिपियां, संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश आदि प्राचीन ग्रंथों की भाषाएं, जैन, बौद्ध, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, वेदांत, चार्वाक् आदि प्राचीन भारतीय तत्त्वज्ञान आदि विषयों का ज्ञान देकर उन्हें प्रशिक्षण देने का उन्होंने संकल्प किया। जिसके फलस्वरूप प्राच्यविद्या के क्षेत्र में रुचि रखनेवाले २० विद्यार्थी उपर्युक्त विषयों के ज्ञान में तथा प्राचीन हस्तलिखितों में लिखित शास्त्रों का संपादन करने में सक्षम हुए हैं। ये प्रशिक्षित विद्वान् शास्त्रों का संपादन करते करते अन्य नये युवाओं को भी गुरुदेव से प्राप्त विद्या की शिक्षा देकर प्राच्यविद्या से अवगत करा रहे हैं। युवा पीढी को इस कार्य में जोडने से आधुनिक तकनीकों का इस कार्य में बहुत उपयोग हो रहा है। जिससे प्राचीन लिपि में लिखित शास्त्रों का लिप्यंतरण (Transcription), दस्तावेजीकरण (Documentation), चिकित्सित संपादन (Critical edition) संशोधन (Research) आदि कार्य आसान हुए हैं।
४) जैन कृति-कृतिकार कोश प्रकल्प –
जैन परंपरा में आजतक विभिन्न विषयों से संबंधित अनेक शास्त्रों की रचना हुई है। पर इन सभी का दस्तावेजीकरण नहीं हो पाया है। पूज्य गुरुदेव ने इस संकल्पना को लेकर जैन कृति-कृतिकार कोश नामक प्रकल्प प्रारंभ किया। जिसमें भगवान महावीर के निर्वाण पश्चात् करीबन २३०० साल में रचित ग्रंथों की सूचि का निर्माण किया जा रहा है। अद्यावधि रचित शास्त्र एवं शास्त्रकारों की विस्तृत जानकारी इसके माध्यम से उपलब्ध होगी। जिससे एक सर्वसमावेशक प्राचीन शास्त्रसंपदा की विरासत सभी के सामने प्रस्तुत होगी। पूज्य गुरुदेव की संकल्पना एवं उनके मार्गदर्शन में यह कार्य विश्व में सर्वप्रथम बार हो रहा है। इनमें से १०,००० शास्त्रों की तथा ९०० से अधिक शास्त्रकारों की जानकारी उपलब्ध हुई है। इस प्रकल्प को शीघ्र ही पूर्ण करने की मनीषा है। जिससे उपलब्ध कृतियों का संपूर्ण संकलन का वलभी के साथ संलग्न करके उन शास्त्रों के हस्तलिखितों से संबद्ध करने की भावना है। जिससे प्राचीन शास्त्र, उन शास्त्रों के रचयिता एवं उनके प्राचीन हस्तलिखितों की जानकारी के रूप में एक विशाल डेटाबेस विश्व के समक्ष प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत होगा।
५) पांडुलिपि स्केनिंग प्रकल्प –
विश्व में किसी के पास नहीं ऐसी ज्ञान की अनमोल विरासत भारत के पास है। पहले अंग्रेजों के कारण, बाद में परधर्मियों के आक्रमण की वजह से प्राचीन शास्त्रों का विनाश होता रहा है। हस्तलिखित नष्ट हो गये तो उसमें लिखा हुआ ज्ञान भी नष्ट हो जाता है। भारत की इस अमूल्य विरासत को चिरकाल तक सुरक्षित रखना है तो प्राचीन हस्तलिखितों की सुरक्षा अतीव महत्त्वपूर्ण है। भारत की प्राचीन ज्ञान की विरासत को सुरक्षित रखने हेतु ज्ञानभंडारों में संग्रहित प्राचीन हस्तलिखितों का स्केनिंग करने का कार्य इस प्रकल्प में होता है। इसके लिए विशेष प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं को नियुक्त किया है। जो उन हस्तलिखितों का अत्यंत सावधानी से स्केनिंग करते हैं और उन हस्तलिखितों की नैसर्गिक वातावरण एवं आपदाओं से सुरक्षित रखने के लिए उन उन ग्रंथागारों को सूचना देकर रखरखाव में भी सहयोग देते हैं। गणिवर्य वैराग्यरतिविजयजी म.सा. के मार्गदर्शन में स्केन किये हुए इन हस्तलिखितों का सुव्यवस्थित प्रारूप में सूचिपत्र निर्माण किया जाता है और उस ग्रंथागार को समर्पित किया जाता है। इस प्रकल्प से बहुत सारे अद्यावधि प्रकाश में न आये हुए उपयोगी ग्रंथ प्रकाश में आते हैं। जो आगे जाकर संपादित होकर प्रकाशित होकर भारत के प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति को उजागर करते हैं।
उपर्युक्त सभी प्रकल्प परस्पर-पूरक हैं और भारत की प्राचीन धरोहर के अज्ञात पहलुओं को प्रकाशित कर आनेवाली पीढ़ी को सौंपने के कार्य में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इन प्रकल्पों की संरचना कर गणिवर्य वैराग्यरतिविजयजी म.सा. प्राचीन भारतीय संस्कृति और इतिहास के संरक्षण के कार्य में बड़ा योगदान दे रहे हैं। इस प्रकल्प के कार्य में भारत तथा विदेश के अनेक विद्वानों का सहयोग प्राप्त हो रहा है।
उपलब्धि—
गणिवर्य वैराग्यरतिविजयजी म.सा. के मार्गदर्शन में—
२० से अधिक युवा प्राच्यविद्या के क्षेत्र में सज्ज होकर संशोधन कार्य कर रहे हैं।
३०० से अधिक शास्त्रों का संपादन किया है।
भारत के १०० से अधिक प्राचीन हस्तलिखित संग्रहों का स्केनिंग एवं सूचीकरण का कार्य हुआ है। जिसमें १ करोड से अधिक पत्रों को डिजिटाइज्ड प्रारूप में सुरक्षित किया है।
७० प्राचीन हस्तलिखित भांडागारों का सूचिपत्र निर्माण किया है। एवं २० से अधिक युवा विद्यार्थियों को इस प्राच्यविद्या के क्षेत्र में तैयार किया।
१०,००० से अधिक शास्त्रों की तथा ९०० से अधिक शास्त्रकारों की जानकारी का संकलन किया है।
प्राच्यविद्या के क्षेत्र में युवाओं को जोडने एवं उनमें रुचि उत्पन्न करने का महत्त्वपूर्ण कार्य हुआ है।
गणिवर्य वैराग्यरतिविजयजी म.सा. ने भारत की शिक्षापद्धति, भारत के प्राचीन विद्यापीठ, भारत की प्राचीन लिपियां, शिलालेख, प्राचीन हस्तलिखितों की सुरक्षा, हस्तलिखितों का इतिहास, हस्तलिखितों के विनाश के कारण और उनको सुरक्षित रखने के उपाय, भारत की लेखन लेखन परंपरा- लेखन सामग्री इत्यादि विषय से संबंधित अनेक संशोधनपरक लेखों का लेखन किया है। जिससे भारत का प्राचीन इतिहास एवं ज्ञानसंपदा पर विशेष विचार प्रस्तुत हुए हैं।
गणिवर्य वैराग्यरतिविजयजी म.सा.भारत की प्राचीन ज्ञानसंपदा के संरक्षण, संवर्धन एवं उसका आनेवाले पीढी तक पहुंचाने के लिए समाज में निरंतर जागृति लाने के कार्य में सदैव तत्पर रहते हैं।
लोकप्रकाश नामक जैन परंपरा का सर्वमान्य विश्वकोश ग्रंथ का सर्वप्रथम १६ भागों में चिकित्सित संपादित आवृत्ति का निर्माण किया है।
ये सभी उपलब्धियां भारत के प्राचीन इतिहास को उजागर करने में सक्षम हुए है। गुरुदेव का इस कार्य के प्रति का समर्पणभाव अत्युच्च कोटि का है। साधुजीवन में पदवी प्राप्त करने के लिए विशेष अनुष्ठानादि कार्य होते हैं यदि उनमें व्यस्त होंगे तो इस कार्य के प्रति दुर्लक्षता होगी फलतः जीवन के महत्त्वपूर्ण क्षणों का सदुपयोग न होगा यह सोचकर साधुजीवन में प्राप्त होनेवाले पंन्यास, आचार्य इत्यादि पदवियों के प्रति उदासीन रहते हुए अपने आप को इस कार्य में व्यस्त रखा है। सामाजिक सन्मान-सत्कार से परे रहकर उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन इस प्राच्यविद्या को दृढ बनाने में समर्पित किया है। इससे उनका इस कार्य के प्रति का प्रेम और हमारी प्राचीन विरासत को सुरक्षित रखने का अविरत परिश्रम दृष्टिगोचर होता है।
इस कार्य में अनेक विद्वानों का सहयोग प्राप्त हो रहा है। जिनमें पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त गुजरात के पद्मश्री डॉ. कुमारपाळ देसाई जो अपने वर्तमानपत्रों (गुजरात समाचार) के अंकों में गुरुदेव द्वारा लिखित लेख, पुस्तक आदि की समीक्षा लिखते हैं।
गुजरात गौरव पुरस्कार प्राप्त एल्.डी. इन्स्टिट्युट ऑफ इंडोलोजी, अहमदाबाद के निर्देशक डॉ. जितेंद्र बी. शाह गुरुदेव के कार्य में सहयोग दे रहे हैं।
इसके अलावा ३५ प्राचीन लिपियों के जानकार भारत के एकमेव विद्वान् डॉ. अनिर्वाण दश, प्राच्यविद्या के क्षेत्र में राष्ट्रपति पुरस्कार से सन्मानित, सोलापुर विद्यापीठ के संस्कृत-प्राकृत भाषा विभागप्रमुख डॉ. महावीर शास्त्री, डीआरडीओ के पूर्व वैज्ञानिक डॉ.एम.बी.मोदी आदि अनेक विद्वानों के साथ संपर्क में है।
मेरा विश्वास है कि परम पूज्य श्री वैराग्यरतिविजयजी द्वारा हो रहा यह ग्यान का काम नहि थमेगा.

गुरुदेव के मार्गदर्शन में अब तक –
20 से अधिक युवा प्राच्यविद्या-विद्वान तैयार होकर संशोधन-कार्य कर रहे हैं।
300 से अधिक शास्त्रों का चिकित्सित संपादन किया गया है।
भारत के 100 से अधिक प्राचीन हस्तलिखित-संग्रहों की स्कैनिंग एवं सूचीकरण का कार्य हुआ है, जिसमें 1 करोड़ से अधिक पन्नों को डिजिटाइज्ड रूप में सुरक्षित किया गया है।
70 प्राचीन हस्तलिखित भंडारों के सूचिपत्र तैयार किए गए हैं और 20 से अधिक विद्यार्थियों को इस प्राच्यविद्या-क्षेत्र में प्रशिक्षित किया गया है।
10,000 से अधिक शास्त्रों तथा 900 से अधिक शास्त्रकारों की जानकारी का संकलन किया गया है।
प्राच्यविद्या के क्षेत्र में युवाओं को जोड़ने एवं उनमें रुचि उत्पन्न करने का महत्त्वपूर्ण कार्य संपन्न हुआ है।
